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मेरे अल्फाज़

खुद को देखता हूँ

Anand Pravin

20 कविताएं

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मैं जब कभी खुद को देखता हूँ
दो राहे पर खड़ा देखता हूँ।

एक तरफ सावित्री का साथ
बिट्टू का प्यार और मुनिया दुलार देखता हूँ

एक तरफ उनके पहनने- ओढ़ने और
अच्छे से रह पाने की जुगत में
मीलों दूर मज़बूरी सिर पर ढोये
खुद को लाचार देखता हूँ।

मैं इस हालात से डरा सा रहता हूँ।

मैं जब कभी खुद को देखता हूँ
दो राहे पर खड़ा देखता हूँ।

ये कैसा सफर है मेरा
जिसमें एक कदम भी चला ही नहीं।
दर्द और नफ़रत तो हमेशा से साथी रहे
प्यार ज़िन्दगी में कभी मिला ही नहीं।

मैं इस घुटन को दिल ही दिल में दबा लेता हूँ।

मैं जब कभी खुद को देखता हूँ
दो राहे पर खड़ा देखता हूँ।

ये पैसों की दुनिया
बड़ी बेरहम दुनिया है।
मानवता, प्रेम, रिश्ते- नाते
सबसे ऊपर यहाँ पैसा है।

मैं हमेशा खुद को पैसों के लिए अपनों से दूर पाता हूँ।

मैं जब कभी खुद को देखता हूँ
दो राहे पर खड़ा देखता हूँ।

आनंद प्रवीण, पटना।


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