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मेरे अल्फाज़

मुख़्तलिफ़ सा होकर भी…

ANAND KUMAR MALI

3 कविताएं

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मुख़्तलिफ़ सा होकर भी कुछ कुछ उस सा लगता हूं...
के रंग अपने होठों से मेरे होठों पे उसने उतार दिए थे कभी...


हर ओर गूंजती सुनाई देती है हस्ती अपनी ही इस शहर में...
के पीछे से नाम मेरे उसने पुकार दिए थे कभी...


घर अपना होके भी उसकी खुशबू सा महकता है...
के हाथ हर दीवार पे उसने फेर दिए थे कभी....


वो हम नफस है, हमराही है या खुदगर्ज है कोई, क्या फर्क पड़ता है
हम तो खुश है के उसने उंगलियों से मेरे हाथों पे अपने नाम उकेर दिए थे कभी...


बगीचे में मिलते है तो मिलते है गुलाब अब बस एक नाम लिए हुए...
के कुछ शामे संग उसने मेरे वहां बिता दिए थे कभी...


रोशनी अब आती नहीं खिड़कियों से दरारे ढूंढ़ती है...
आखिर अपने हाथों ही पर्दे उसने लगा दिए थे कभी...


दिल भी दुबका हुआ सा बैठा रहता है अब तो एक कोने में चुप चाप...
के हरकते इसकी सारी उसने एक दिन सुधार दिए थे...
मुख़्तलिफ़ सा होकर भी कुछ कुछ उस सा लगता हूं...
के रंग अपने होठों से मेरे होठों पे उसने उतार दिए थे कभी...



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