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मेरे अल्फाज़

माया जाल

Amita Singh

6 कविताएं

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ज़िन्दगी तू उम्र भर,
करती रही सौदा सपनों का।
छलती रही दिवा-स्वप्नों से
देती रही झांसा ख़ुशियों का।
दौड़ती रही नग्न पांव
तपते-सुलगते अतृप्त,
इच्छाओं के मरुस्थल में,
भटकती रही सुखों-
के मारीच वन में ।।
समझ चुकी हूं अब,
छलना है मिथ्या है तू,
झुठी सी मादक हंसी-
सा नकली है तेरा ये
सब माया जाल।।



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