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Wandrer of Towns

मेरे अल्फाज़

दूजा शहर

amit tripathi

7 कविताएं

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थोड़ी बेचैनियों के संग वो
किवाड़ खोलता है।
तितर- बितर है सब मकान में
ये बात वो बार- बार बोलता है 

अंगीठी संग कुर्सी लगाकर वो,
इकटक दीवार देखता है।
पुराने अखबारों में वो ,
अपने शहर का हालचाल देखता है

हर शाम वो अपने शहर जाने के 
सपने बुनता है 
आधी रात ये शहर,
उसके सपनों को रौंद देता है

वो इस शहर के पिंजड़े को
फिर झकझोरता है।
शहर अट्हास में उसे बेबस
बोल देता है।

तमाम खींचातानी का सच,
उसको टटोलता है।
हजारों मील की दूरी को वो,
लाखों मील बोलता है 

रोजी रोटी की बेड़ी उसे,
सो जाने को कहती है।
माँ के हाथों की रोटी उसे 
सबकुछ छोड़कर आने को कहती है

वो तकदीर की किताब चोरी,
करना चाहता है
अपना शहर मिल जाए
बस इतना ही बदलना चाहता है 

बटुए के कागजों को यारों संग 
खर्च करना चाहता है 
अपने शहर की गलियों में
वो शामें करना चाहता है 
ये बागी बस इक बार
शहर बदलना चाहता है

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