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मेरे अल्फाज़

प्रकृति का संदेश

AMIT Nayak

3 कविताएं

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प्रकृति का संदेश

मैं देवी से -
कितना प्रेम भरा था तुम में, आज क्यूं इतना रौद्र हुयीं।
पेड़-पशु और पर्वत काटे, उस पर भी तुम रहीं।
आज हुआ क्या ऐसा देवी, जो इतना कोहराम मचाया।
मानवता को भूल चुके मानव को पाठ पढ़ाया।

देवी -
सौंदर्य भरा है मुझमें कितना, कुदरत ने मुझे बनाया।
पशु-पक्षी वन पर्वत झरने, फूलों से मुझे सजाया।
रवि गगन चांद सितारे, ये सब मेरी काया।।
जीव-जन्तु वन-उपवन मानव, सब कुछ मुझमें समाया।
एक-दूजे के पूरक हैं सब,
सबकी अपनी सीमा।
दानव बन गया मानव, लांघ दी कब की सीमा।
जल वायु सब दूषित कर दी, देख रही थी मैं सब मौन।
मानव को बतलाना जरुरी,
नासमझ आखिर है तू कौन।
यदि संतुलन बिगड़ा मेरा, देख बड़ा पछतायेगा।
विज्ञान युग का वो दौर, विनाशकाल कहलायेगा।
समय है अब भी रुक जा,
फिर कौन तुझे समझायेगा।
कुदरत के कहर से आखिर, कब तक तू बचपायेगा।
एक वचन दो नायक, क्या तुम वृक्ष लगाओगे।
पेड़ पशु वन पर्वत के प्रति,
अपना धर्म निभाओगे।
प्रकृति उपासक रहे पूर्वज, वही सभ्यता अपनाओगे।
पीपल गाय और गंगा पूजकर , प्रकृति प्रेम दिखलाओगे


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