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मेरे अल्फाज़

बिसराते नहीं हैं

amit kumar chaudhary

11 कविताएं

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बिसराते नहीं हैं,वे दिन रात मेरे
बचपन की बाते,वे खेल-खिलौने
खेलते फिरते वे साँझ-सवेरे।
अम्मा का आँचल,वे ममता की छाये
पिता जी की स्नेहिल फटकारे
थप्पड़ तमाचे,रुला कर जो जाते।
दादी मुझे प्यार से फुसलाती
दादा जी भी झूठा गुस्सा दिखाते।
वे स्कूल अपने,
जाने में होते हजारो ही नखरे
आचार्य जी जो पाठ पढ़ाते
नहीं याद होता बहुत मार खाते।
पिता जी टांगो पर झूला झुलाते
बिठाकर कांधे पर मेला खुमाते
ढेरो मिठाई वहाँ से लेआते
रखी मिठाई चुराकर खाते
पूछती जो अम्मा मुह कर जाते।
संघी संघाती संग मौज उड़ाते
वे नदियों तालाबो के सैर सपाटे
कंकड़ उठाते नदी में गिरते
उठे बुलबुला खूब ताली बजाते।
गेंद और बल्ले,वे गुल्ली और डंडे
लंगड़ लड़ते ,वे डोर पतंगे
खाने पकाने का खेल अनोखा
सभी कुछ न कुछ,अपने घर से ले आते
खाते खिलते,धूम मचाते।
पर,कहाँ रह गया,वे दौर पुरान
मासूम मन ढेरों जिज्ञासा
काश वही दिन फिर लौट आये
एक बार और हमें बचपन मिल जाये।

- अमित कुमार चौधरी
शोध छात्र लखनऊ विश्वविद्यालय

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