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makar sankraati par patang kee ulajhee dor

मेरे अल्फाज़

मकर संक्राति पर पतंग की उलझी डोर

Ambrish Bhardwaj

173 कविताएं

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मैंने तो बचपन में
सिर्फ एक बार
पतंग उड़ाई थी

पतंग से पतंग के
पेंच जो लड़े
जम कर लड़े

आज तक उस
पतंग की डोर का
धागा सुलझा रहा हूँ

बहुत अजीब था वो
मकर संक्रांति का
उत्तरायण.......

बहुत अजीब लड़े थे
पतंग से पतंग के पेच

- अम्बरीश भारद्वाज
आगरा, उत्तर प्रदेश

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