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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल.....

Amber Srivastava

73 कविताएं

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दिख जहाँ भी जाये नफ़रतों को मिटाते चलिये,
एक तकाज़ा इंसानियत का भी निभाते चलिये।

आग कितनी बरपा रखी है ज़ालिमों ने जग में,
अमन की बारिश से जरा इसको बुझाते चलिये।

है गुलों को इंकार खिलने से जले गुलशन में,
चमन को अपने तबस्सुम से ही सजाते चलिये।

दौर है माना साज़िशों औ तल्ख़ियों का दिल में,
आप अपनी ज़ानिब सभी रिश्ते निभाते चलिये।

बहुत आसाँ है गलतियों पर उँगली का रखना,
सुधर जाने को आँख पर परदा गिराते चलिये।

खबर ज़ामाने से नहीं ली तो है मिरे दोस्तों ने,
गफलतों में ना हो कहीं घर पर बुलाते चलिये।

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