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मेरे अल्फाज़

अमरनाथ यात्रा वर्णन

ऋतु बाला

87 कविताएं

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नियमित दिनचर्या से पाने को विश्राम,
भक्ति भाव लेकर चले थे शिव धाम।

यात्रा कठिन थी अनिश्चित समय लगना था,
हमें आठ सौ किलोमीटर का सफर करना था।

मार्ग में प्रकृति के अद्भुत नजारे थे,
हिमाच्छादित पर्वतों के दृश्य बड़े प्यारे थे।

वृक्ष जटित पर्वत दिन में अति सुंदर थे,
किंतु रात्रि में लगते भूधर अति भयंकर थे।

सेना के जवान चप्पे-चप्पे पर तैनात थे,
उनकी हिम्मत और हौसले भी हमारे साथ थे।

सैनिकों की कर्तव्यनिष्ठा मन को गद-गद करती थी,
यात्रियों की टोली उन्हें हाथहिलाकर सैल्यूट करती थी।

अमरावती की कल-कल हृदय हर रही थी,
धीरे-धीरे इस तरह हमारी यात्रा चल रही थी।

बीच-बीच में होने वाली बारिश जब डराती थी,
बम बम भोले के जयकारों से शक्ति आती थी।

अश्वारूढ होकर इतना कभी चले ना थे,
फिर बर्फ में चलकर भी पांव गले न थे।

गुफा की सीढ़ियां पूरी तीन सौ पचास थीं,
मन में बर्फानी बाबा के दर्शन की आस थी।

थक कर सीढ़ियां चढ़ना आसान न था,
पर उतरते समय थकान का निशान न था।

बर्फ के शिवलिंग के अलौकिक थे दर्शन,
एक क्षण को जैसे सब टूट गए बंधन ।

नाथों के नाथ भगवान श्री अमरनाथ,
अपने आशीर्वाद से सब को करें सनाथ।

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