मंजिल दूर बहुत है मेरी

                
                                                             
                            दम भरती हो जीवन पथ पर तुम मेरे ही साथ चलोगी,
                                                                     
                            
अच्छा है, पर पुनः सोच लो, मंजिल दूर बहुत है मेरी।

उस मंजिल की सुखद चाह में लाखों मंजिल छोड़ सकोगी?
मेरे इस सपने की खातिर, अपने सपने तोड़ सकोगी?
तोड़ सकोगी उन रिश्तों को, जिनसे जुड़कर रही सदा ही?
और सदा से उसी दिशा में, बहती नदियां मोड़ सकोगी?
तूफानों से लड़ने में तुम, माना सक्षम रही सदा ही,
तूफानों से तूफानों की, यहां नहीं पर पल भर देरी।

तुम्हें साथ मैं लेकर चलने को अब तक तैयार नहीं हूं।
और तुम्हारे सपनों का भी, मैं शायद आधार नहीं हूं।
तुम मेरे दिल में आ जाओ, ये नामुमकिन है समझो तुम,
और जान लो राजकुमारी, मैं भी तेरा प्यार नहीं हूं।
हम दो राही एक राह के, लेकिन मंजिल अलग हमारी,
मेरी मंजिल दूर आसमां, और जमीं है मंजिल तेरी।

हमराही हो सकते हैं हम, लेकिन हम हमसफ़र नहीं हैं।
इन बातों में प्रेम नहीं है, जो मैंने अब तलक कहीं हैं।
परिचित और अपरिचित लोगों में कुछ तो अन्तर होता है,
शायद आप अधिक आकर्षण में मर्यादा भूल रही हैं।
मर्यादा जब सीमा रेखा से बाहर हो जाती है,
मर्यादा में रहने वालों को होती है पीर घनेरी।

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1 month ago
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