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मेरे अल्फाज़

जग एक विचित्र पहेली

alok Singh

4 कविताएं

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क्यों मैं जग के अनुरूप चलू,
क्यों मैं सोचूं जग क्या कहता है,
जग नहीं जो मुझे डिगा सके,
जग है एक विचित्र पहेली,

कामयाबों से हिंसक भावना,
नाकामयाबों की निंदा,
है ये जग की विचित्र भावना,
जग है एक विचित्र पहेली,

अराजकता का मूल स्रोत ये,
यहा सभी अपने अपने में,
फिर क्यों मैं जग के अनुरूप चलूं,
जग है एक विचित्र पहेली

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