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मेरे अल्फाज़

आँसू मेरी सुनते नहीं

Alka patawari

23 कविताएं

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एक मेरे आँसू ही हैं,
जो मेरे शब्दों की राह नहीं जोते,
निकल पड़ते हैं स्वतः ही, कहानियाँ वो बताने को,
शब्द जिनके अक्षर ढूंढ नहीं पाते...
कह जाते ये वो बातें ज़माने को,
शब्द जिन्हें छुपाने की कोशिश कर जाते....
समझ जिन्हें बताने से मना करती,
उन अधूरी बातों को ये पूरा कर जाते।

आँसू ये मेरे कई बार निकले,
कभी गम में निकले,
तो कभी खुशी में निकले।
कभी मिलन में निकले,
तो कभी बिछोहः में निकले।
रोने में तो ये हरदम ही निकलते,
कभी-कभी हंसी के भी निकले।
कभी बूँद बूँद बन टपके,
तो कभी धुँआधार बारिश से भी ये बरसे।
नैनों को तो ये हरदम ही भिगोते,
कभी कभी मन को भी भिगो जाते।
और जब कभी भी ये अपनी झड़ी लगाते
भीतर पल रहे गुबार को अपने संग बहा ले जाते......

करते आए ये हमेशा अपनी ही मनमानी,
निकल आते हैं जब-तब,बताने कोई बात नई पुरानी
रोकने की इन्हें,मैं कोशिश करती नहीं
क्योंकि ये मेरी कभी सुनते नहीं...

अलका पटावरी


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