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मेरे अल्फाज़

निर्झर

सुरेश अकेला

5 कविताएं

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हे निर्झर एकान्त बैठ, तू कैसी तान सुनाता है 
कल-कल की ध्वनि गूँज रही है,गाकर किसे बुलाता है 
उत्तुंग शिखर प्रस्तर से गिर 
जल की धारायें बिखर बिखर 
टकराती शैलों के ऊपर 
हो चूर बिखरती इधर-उधर 
मीठा-मीठा ठंडा ठंडा, अविरल जल सतत लुटाता है 
कल-कल की ध्वनि गूँज रही है, गाकर किसे बुलाता है
उठ रहा धूम्र तेरे ऊपर 
कुहरा-वाष्प जैसे तुझ पर 
है शीतल जल फुहार उस पर 
टूटे भ्रांति समीप जाकर 
बही दूध की धारा जैसे, आती मुझे दिखाता है 
कल-कल की ध्वनि गूँज रही है,गाकर किसे बुलाता है 
कहीं तेरे बंधु दहाड़ रहे 
कहते हम काट पहाड़ रहे 
डरावनी ध्वनि चिघ्घाड़ रहे 
कानों के पर्दे फाड़ रहे 
पर्वत पठार के मस्तक पर, तेरा निवास दिखलाता है 
कल-कल की ध्वनि गूँज रही है, गाकर किसे बुलाता है
है बना कुंड तेरे नीचे 
आकर्षण जल नींचे खींचे 
उपयोग में मानव न पीछे 
विद्युत बना खेत सींचे 
चमक गया घर-गाॅव-नगर, उपकारी बन हर्षाता है 
कल-कल की ध्वनि गूँज रही है, गाकर किसेबुलाता है 
वेनेजुएला न्याग्रा प्रपात 
आकर्षक दृश्य रचते प्रपात 
मनमोहक होते हैं प्रपात 
जैसे सुंदर होता प्रभात 
तरुणाई में नदियों के संघ, तू ही मौज उड़ाता है 
कल-कल की ध्वनि गूँज रही है, गाकर किसे बुलाता है

- सुरेश अकेला, प्रतापगढ़

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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