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मेरे अल्फाज़

बटोही आगे बढो

सुरेश अकेला

5 कविताएं

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चाहे कठिन पंथ कितना भी लागे 
बटोही बढ़ा चल निरंतर तू आगे 

न कोई सहारा न कोई तुम्हारा 
घिरी किश्ती जल में न कोई किनारा 
विपत की तरंगों से विचलित न होना 
भयंकर तुफाॅ से धैर्य को न खोना
निराशा से ना पैर पीछे हटाना 
उत्साह मन का न मन से घटाना 
जोखिम से जोखिम हो पथ चाहे आगे 
बटोही बढ़ा चल निरंतर तू आगे 
नहीं पास माया है इतना तुम्हारे 
कि हर सुविधा मिल जाए उसके सहारे 
है जिनके, उसी ने न सब कुछ है पाया 
कितनो ने इस भ्रम को हरदम मिटाया 
तुम्हारे से बद् स्थिति कितने की होती 
पर वो सफलता की तोड़े हैं मोती 
अलापो न बद् किस्मती की तू रागें 
बटोही बढ़ा चल निरंतर तू आगे 
काली निशा हो या काली घटाएँ 
न मिलती हो चाहे स्वजन की दुवायें 
परिस्थितियाॅ प्रतिकूल चाहे हो जाये 
कठिन है परीक्षा न विचलित हो जाए 
दुःख दर्द दिनकर की हो धूप कितनी 
नही तोड़ना दृढ़ प्रतिज्ञा है अपनी 
दिल में तुम्हारे हताशा न जागे 
बटोही बढ़ा चल निरंतर तू आगे 
जलनें दो दुनियां की है रीति जूनी 
उनके बिना ऊर्जा तेरी सुनी 
विद्वेष की भावना मन न आये 
तुझे क्या है मतलब किसे क्या सुझाये 
सभी से बात प्रेम से कर अकेला 
मिट जाएगा सब घृणा का झमेला 
रखो सोंच सबसे हट करके आगे 
बटोही बढ़ा चल निरंतर तू आगे 
मन में लगन हो तो मंजिल मिलेगी 
चाहत की बगिया भी तेरी खिलेगी 
मेहनत की खुशृबू से महकेगा आँगन 
नहीं कोई तुझको कहेगा अभागन
सबक लेगी तुमसे आगे की पीढ़ी 
लगा दो चमत्कार की एक सीढी 
परिवर्तन प्रकृति का नियम सदा आगे 
बटोही बढ़ा चल निरंतर तू आगे 
अलग पथ है सबका अलग मंजिलें हैं 
कभी मेल खाते कदम भी मिले हैं 
एकाग्र तन -मन से श्रम जो है करता 
भटकता नहीं मार्ग पर ही जो चलता 
सफलता उसी का चरण चूमती है 
दुनियाॅ उसी नाम पर झूमती है 
प्रभू उसकी पूरी करता है माॅगे 
बटोही बढ़ा चल निरंतर तू आगे

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