आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   aakhir kab tak

मेरे अल्फाज़

आखिर कब तक

Akhil Akhil

32 कविताएं

69 Views
कब तक शरहद पर जवान शहादत देते रहेंगे
कब तक हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे
कब तक आखिर कब तक ये सिलसिला चलता रहेगा
क्या भारत माँ के जवानों का लहू यूँ ही बहता रहेगा
मैं पूछता हूँ कब तक आखिर कब तक
माएँ अपने बेटों की कुर्बानी देंगी, कब तक
सुहागिनें अपने सिन्दूर की कुर्बानी देंगी, कब तक
बच्चे अपने पिता को खोते रहेंगे कब तक
पिता बेटों की अर्थी को काँधा देते रहेंगे कब तक
रोयेंगी बहनें भाई की पकड़ कलाई को,कब तक
भाई सहेंगे भाई से भाई की जुदाई को कब तक
जवानों के शीश उतारे जायेंगे, कब तक
बेकसूर लोग यूँ ही मारे जायेंगे कब तक
जब तिरंगे में लिपट लाश जवानों की आती हैं
खून उबलता है सीने में आँखें नम हो जाती हैं
लोमड़ियां आँखें दिखातीं हैं शेर ए हिन्दुस्तान को
एक शेर ही काफी है हिन्द का पूरे पाकिस्तान को
काश्मीर का मुद्दा अब खुद ही हल करना होगा
बार बार लड़ने से अच्छा एक बार लड़ना होगा
वीर अब्दुल हमीद बनकर अब तुम्हें लड़ना होगा
भगत सिंह का अवतार भी अब तुमको धरना होगा
उठो चलो एक नया इतिहास लिखो
भगत सिंह की जन्म भूमि पर फिर से हिंदुस्तान लिखो
जब हिंद का तिरंगा लाहौर में लहरायेगा
काश्मीर का मुद्दा खुद ही हल हो जायेगा

अखिल बदायूंनी

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!