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मेरे अल्फाज़

ईमानदारी...

Akash Kumar

14 कविताएं

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जब से शराफत का साया चला गया।
जो कुछ था कमाया चला गया।
सारी दौलत मैने ईमान ख़रीदी थी।
ईमान बिका तो समंदर का किनारा चला गया।
मुकद्दर संवारने को आसमां तक पैर मारे।
मंज़िल न मिली फो दो रोटी का सहारा चला गया।
अब तो दरख्तों के साये में धूप लगती है।
लग रहा है सर से माँ का साया चला गया।
रौनक बारात की परवान चढ़ी थी।
हुआ बवाल तो परवाना कुवांरा चला गउया।
क्या खोया जो बचपन गँवा दिया मैंने।
आँखों से आँसुओं का आशियाना चला गया।

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