ग़ज़ल

                
                                                             
                            ये बदचलन हवा इंसां को कहां तक ले जाएगी
                                                                     
                            
जँहा शुरू होगी कयामत वँहा तक ले जाएगी
वक्त रहते गर न सम्भले तेरे बहके हुये कदम
वक्त की रफ्तार बेशर्मी की इंतहा
तक ले जाएगी
बढ़ी तक़रार तो होगा, इंसानियत का कत्लेआम
हथियारों की दौड़ जहांन को, हांसिया तक ले जाएगी
खजाना खाली करके, दल बदल लिया करो
यही आदत कुर्सियों की, हमें क़ाबिरस्तान तक ले जाएगी
कुछ पल निकाल कर, लो दो पल ख़ुशी के
ये मुस्कान तुझे खुशियों के, मकां
तक ले जाएगी
पग रज ले लिया करो, आशियां छोड़ने से पहले
माँ की दुआ जमीं से, आसमां तक ले जाएगी
दिल धुल खारे जल से, अमन ओ चैन पैदा कर
ये मोहब्बत की जुंबा , अमर दांस्ता तक ले जाएगी

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3 years ago

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