आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Nasebo ka racha ik khel mere darmiya hai ab

मेरे अल्फाज़

नसीबों का रचा इक खेल मेरे दरमियाँ है अब

Ajay Upadhyay

55 कविताएं

208 Views
मेरी आदत है खुद को मैं कभी झुठला नहीं सकता

तेरी कीमत समझता हूँ तुझे बतला नहीं सकता

नसीबों का रचा इक खेल मेरे दरमियाँ है अब

मैं तुझको चाहता हूँ पर मैं तुझको पा नहीं सकता


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!