आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Narazgi Kaagzi Teri

मेरे अल्फाज़

नाराज़गी कागज़ी तेरी

Ahtesham Ahmad

20 कविताएं

72 Views
दोस्ती की हाथ बढ़ाई हम ने देख सादगी तेरी
खिल उठी ख़ुशी से बाग-ए-ज़िन्दगी मेरी

जाने कौन सी बात मेरी घर कर गयी दिल में तेरी
साँसे कमज़ोर पड़ गयी उस दिन दोस्ती की बंदगी मेरी

रास न आयी मुझे इस तरह की नाराज़गी तेरी
बख्श दे गर तू समझता है खता है कोई मेरी

पता है मुझे ये सारी नाराज़गी है कागज़ी तेरी
नाराज़ होने के वास्ते पड़ी है पूरी ज़िन्दगी तेरी-मेरी

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!