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मेरे अल्फाज़

स्वयंवर की कथा

Abhishek Tiwari

3 कविताएं

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आओ यारों एक कथा सुनाऊ
बदलते समय की एक व्यथा सुनाऊं
मातृप्रधान देश था अपना
पितृप्रधान आज हुआ हैं।

पहले तय करती थी स्त्री
किसके घर हैं हमको जाना
पर आज तय करते हैं जन
किसको अपने घर हैं लाना।

पहले स्वयंवर हुआ करता था
आज स्वयंवधु होता हैं
वर तो हैं आज भी मगर
स्वयं कहीं पर सोता हैं।

रधुकुल में हुआ स्वयंवर
और स्वयंवर गीता में
आज भी हैं स्वयंवर
मगर किताब और गीतों में।

एक तरफ तो प्रेम कहा हैं
गीता और कुरान में
दूजा उसको अपनाया तो
पहुंचाया श्मशान में

पर तिवारी की अपनी अलग राय हैं
प्यार तोड़ा तो बड़ी हाय हैं।
जिसको दूजा घर हैं जाना
अपना पूरा जीवन बिताना
उसके भी कुछ होते सपने
तो वर की ईच्छा हो क्यो न अपने।

आओ यारों विचार करे हम
मन मस्तिष्क से ध्यान करें हम
हर ज्ञान को हम विज्ञान से तौले
धर्म को उसके मर्म से तौले
अपने दिल को आधार बनाओ
भटके समाज को राह बताओ।।

अभिषेक तिवारी

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