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मेरे अल्फाज़

निपट असंगत

Abhay Bhardwaj

7 कविताएं

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क्या तुम्हें मखमली हवा का नरम झौंका कह दूँ
जो आया था कभी मौसम-ए-बहार की वजह
या तुम्हें इन तरसती आँखों का निष्ठुर धोखा कह दूँ
जो मिला था मुझको दिल-ए-करार की जगह

अच्छा तुम ही कह दो कि क्या कह दूँ तुम्हें

चलो तुम्हें तम् से घिरे आसमां में तारों की टिमटिमाती धड़कन कह देता हूँ
जो हर रात धड़कती है मेरे जेहन में और गुम हो जाती है दिन की व्यस्तता में
चलो तुम्हें साँस लेते उपवन की चहकती-महकती महक कह देता हूँ
जो दिन भर त्वरित चलती हैं सीने में और ठहर जाती हैं रातों की व्यथा में

अच्छा छोड़ो जी कुछ नहीं कहता तुम्हें
चुप ही हो जाता हूँ हमेशा की तरह, सिर्फ हमारे लिए
ये सारी लिखी बातें बे-बुनियाद मान लेना तुम
बिलकुल वैसे ही, जैसे मैं निपट असंगत हूँ तुम्हारे लिए
हाहाहा.....जैसे मैं निपट असंगत हूँ तुम्हारे लिए

अभि

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