आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Pukaar Dharti Ki

मेरे अल्फाज़

पुकार धरती की

Aarti Akshay Goswami

2 कविताएं

24 Views
कभी धधकती क्रोधाग्नि में , कभी करती करुण पुकार है ,
कभी लगाती है जलसमाधि , कभी गिराती मद्धम बौछार है ,
बच्चों सा यह हमें है पालती , भरण पोषण हमारा है करती ,
समझ न सके मनुष्य स्वार्थी , प्रकृति पर करते अत्याचार है ,
कदम कदम पर करते दोहन , धरती को छलनी हमनें किया ,
पग पग पर हमनें इसे खोदा , कभी नहीं माना इसे परिवार है ,
क्रांक्रीट की खेती कर डाली , जंगलों को हमनें ही काटा है ,
अपना घर बनाने के खातिर , उजाड़ दिए पंछियों के घरबार हैं ,
हवा पानी भी दूषित कर डाला , इतने लगा दिए हैं कारखाने ,
फैली बीमारी हमारे ही कारण , स्वांस लेना भी दुश्वार है ,
आज प्रकृति असंतुलित होकर , कदम कदम पर हमें डराती ,
लेकिन प्रकृति की इस बिगड़ी हालत के हम ही तो ज़िम्मेदार हैं ,
बिगड़े हुए को सुधारने की शुरुआत अब भी की जा सकती है ,
हर व्यक्ति एक पौधा रौपे , इसी संकल्प की अब दरकार है ,
संतुलित वातावरण को करना , अब मूलमंत्र हो हम सबका ,
हरी भरी हो धरती अपनी , क्योंकि हरियाली ही प्रकृति का श्रृंगार है ।।
आरती अक्षय गोस्वामी
देवास मध्यप्रदेश


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!