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मेरे अल्फाज़

आओ हिंदी सीखें-हिंदी के भेद

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हिंदी का जो बोलूं भेद,
रखो याद, तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज।
मातृभाषा से न हो मतभेद,
मुझसे सुनो, लो इसे तुम रग रग में रज।

तत्सम की जो बात करूँ,
करो याद महर्षि बाल्मीक।
वेदों में और पुराणों में,
जो दे गए हमे जीवन की सीख।
संस्कृत से जो हमने शब्द अपनाए,
वही तो समझो तत्सम कहलाये।

तद्भव की भी है कुछ अजीब कहानी,
संस्कृत से अपभ्रंश बनी जो वाणी।
अक्षी से आंखें बनती, पितृ पिता बन जाता है,
मातृ बने माता, संस्कृत को पास जो लाता है।
मैं से हम की है राह ये गढ़ता,
हर क्षेत्र इसे अपनी भाषा मे पढता।।

बहुरंगी है ये वतन हमारा, रंगों का ही लगा है तांता,
देशज बन हिंदी, सबके ही मन को है भाता।
कोई पूरब कोई पशिम, कोई उत्तर है तो कोई दक्षण है,
देशज की जो गढूं कहानी, इन सब का ये मिश्रण है।
ये सागर है जिसमे भाषा की नदियां आ मिलतीं हैं,
चमन हो कोई, अपनेपन की कलियां खिलतीं हैं।।

पिया मोरे जो गए विदेश, का मुख बोलूं, का बोलूं मैं भाषा,
का कह दूं, का शब्द चुनूं, कौन विधि करूँ प्रकट अभिलाषा।
जो जहाँ मिले, मिलूं सबसे, अपनी धार जरा कुछ तेज करूँ,
हिंदी कहती, बन विदेशज, तेरी दुविधा भी मैं निस्तेज करूँ।
ट्रैन क्रिकेट स्टेशन बॉल, टेंशन मेंशन की भी मैं बात करूँ,
दुनिया के हर कोने में, बन विदेशज मैं भी तेरे साथ रहूं।।

कहे स्वच्छंद सरल भाषा मे, हिंदी अपनी जननी है।
पहचान हमारी, गर्व हमारा, हमारी करनी कथनी है।।

रजनीश "स्वच्छंद"

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