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मेरे अल्फाज़

क्या क्या याद रक्खें

मारूफ आलम

16 कविताएं

हर तरफ मुखतलिफ सोचें हैं क्या क्या याद रक्खें
रूह पर मोहब्बत की चोटें हैं क्या क्या याद रक्खें

बहुत सोच समझकर भुला दिया तेरे हर जख्म को
इस जिस्म पर इतनी खरोंचे हैं क्या क्या याद रक्खें

इन मकबरों में भी दिल नहीं लगता ऐ रहनुमा मेरे
हर तरफ वही पुराने झरोखे हैं क्या क्या याद रक्खें

सोचते हैं किस रस्ते से राब्ते सफ़र बांधकर गुजरें
हर रस्ते पर धोखे ही धोखे है क्या क्या याद रक्खें

तेरी बाहों की कशतियों में आये तो ये जाना हमने
इनमें भी तूफानों के झोखे हैं क्या क्या याद रक्खें

मारुफ आलम


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