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मेरे अल्फाज़

खून जब किसी गुलज़ार से बहता है

मारूफ आलम

64 कविताएं

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ये सिफत है उसकी की बहुत प्यार से बहता है
ये दरिया कम बहता है मगर रफ्तार से बहता है

जब दिल की सरहद कोई अपना तोड़ जाता है
आंखों से फिर तो आंसू भी तेज धार से बहता है

नामाकूल कीड़े भी चले आते हैं भवरों के साथ
गुलों का खून जब किसी गुलज़ार से बहता है

ये तो मामूली सी नदियाँ हैं जो बहती हैं पहाड़ो से
कभी समंदर भी क्या किसी पहाड़ से बहता है

याद आ जाते हैं वो बरसों पुराने मिट्टी के घर बार
छतों से गिरता पानी जब कभी दिवार से बहता है

मारुफ आलम


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