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मेरे अल्फाज़

बेतहाशा जख्म खाए हुए

मारूफ आलम

69 कविताएं

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बेतहाशा जख्म खाए हुए दरारों के साथ
एक आईना चीख रहा था दिवारों के साथ

नींद से जाग कर जिन्हें तलाशते हो यहाँ
सिलसिलेवार चले गए वो बहारों के साथ

उम्रें गुजार दीं चलकर साथ वफा के हमने
और कहाँ तक जायें बता कतारों के साथ

खाक मिल जाना उसे कैसे गवारा गुजरे
जो रहा हो सदियों से ही सितारों के साथ

एक मुद्दत गुजरी डूबे हुऐ दरिया में हमको
आज आकर लगे हैं पार किनारों के साथ

शुक्र हैं भंवर मे फंसाया नहीं हमे खुदा ने
बहके आ गए हम लोग तेज धारों के साथ

- मारुफ आलम

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