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मेरे अल्फाज़

आदमी की कोई हद न रही

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जाने ये क्या हद हो गयी ?
कि आदमी की हद सरहदों में खो गयी
सरहद बना ये आदमी, आदमी है कहां
खोखला उसका वजूद और झूठा उसका जहां,
सगे भाईयों के बीच, आपस में ठनी हो गयी,
आंगन में लगी बांगड़ और घनी हो गयी ?
जाने ये क्या हद हो गयी
कि आदमी मुस्कान गमों में खो गयी
चेहरे पर खिलती थी कभी उसके मुस्कान
गिरगिट सी रंग बदलती है अब उनके मुस्कान
स्वार्थ में हाय ये मुस्कान बिखर गयी
आदमी की मुस्कुराहट, अब आदमी की नहीं रही?
जाने ये क्या हद हो गयी ?
कि आदमी की आंखों की चमक अंधेरे में खो गयी
आंखों में उसकी कभी रहती थी जो मासूमियत
लरजते थे आंसू,प्यार की देने को शहादत
जुल्म ढाती अब उसकी आंखें, अब शैतान हो गयी
हाय आदमी की आंखें, निर्दोषों के खून की प्यासी हो गयी।
जाने ये क्या हद हो गयी ?
कि आदमी की जिंदगी, हादसों में खो गयी
कभी फूलों की तरह महका करती थी जिंदगी
श्रद्धा से नतमस्तक करती थी वन्दगी
आदमी की जिन्दगी एक हादसा हो गयी, गर्दिशों की मानो वह बादशाह हो गयी।
जाने क्या हद हो गयी ?
कि आदमी की जिंदगी समयचक्र में खो गयी
कभी समय के साथ, जो चला करता था आदमी
आज टूटती बिखरती वो जिन्दगी की माला है आदमी
समय के हाथों दो कौड़ी का खिलौना है आदमी
निगल रहा है कालचक्र, हाय चुन चुन कर आदमी।
आज के आदमी के आगे, मज़हब की कोई शान न रही
शानो-शौकत से जी रहा है, वह मज़हब को राजीखुशी
मज़हब के नाम पर, वह फसाद करा रहा है
सच्चे मज़हब का मतलब वह कुछ और बता रहा है।
आदमी, आदमी की आन को मिटा रहा है आदमी
आदमी, आदमी में छिपे भगवान को मिटा रहा है आदमी ।
जाने क्या हद हो गयी ?
कि आदमी की आन, अब मजहबों में खो गयी
कभी मजहब का होकर, जो गया था आदमी
आज तक लौटा नहीं, वह मजहब का आदमी
पीव पहचान उसकी, ख़ुदा से जो हो गयी।
खुद ख़ुदा हो गया, वह मजहब का आदमी।


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