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मेरे अल्फाज़

प्रेम कविता

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आओ बैठें ठांव कोई,
एकांत सूना तरूवर हो,
कोई झूला पडा पास में,
चांद फलक पर बैठा हो,

हर सूं महक फैली जूही की,
हरसिंगार टपकता हो,
फुलों पर शबनम की बूंदें,
ज्यों हर बूंद सितारा हो,

चंदा संग चांदनी छिटकी,
वैसे हम तुम बैठें हों,
अलसी पर मटर गदराये,
फूले सरसों के पौधे हो,

आमों पर बौर लगे,
मन प्रीत में बौराया हो,
हवाओं में मुरली सी धुन,
राधा के पग की रुनझुन हो,
कण कण में झंकार भरा हो,
जैसे वीणा सी बजती हो,

अपना मृदु मिलन प्रेम का
प्रेयसी कुछ ऐसा हो,
जैसे भंवरा कलियों पर मचले,
तितली कोई ज्यों फूलों पर हो,
हम प्रणय पथ पर चले ऐसे,
जैसे राधा संग कान्हा हो।।

मृत्युंजय राय अमर

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