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मेरे अल्फाज़

खुद में जान बहुत है

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चलने को धरती कम नहीं,
उड़ने को आकाश बहुत है।
मंजिल अब इतनी भी दूर नहीं,
आँखों में ख्वाब बहुत है।
चलोगे सुबह तो सूरज की किरनें साथ होंगीं,
रातों में चाँद की चाँदनी साथ चलेगी ।
अमावस के अँधेरे की फिक्र करना नहीं,
प्रकाश करने को तो तारों की बारात बहुत है।
राहों में काँटे भी चुभते हैं,
फूलों की बरसात भी होती है ।
आँखों से आँसू भी निकलते हैं,
राहत की साँस भी होती है ।
हर पल एक सा मौसम हो सकता नहीं,
ऐसे में भी जीने का मजा बहुत है।
चलते-चलते थक जाना नहीं,
बढ़ते-बढ़ते रुक जाना नहीं,
राहों में मुश्किलें इतनी भी नहीं,
उनसे निपटने को खुद में जान बहुत है।।




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