मोहब्बत का गीत

                
                                                             
                            साइकिल ले के निकल पड़ा हूं शहर-ए-मोहब्बत कि गलियों में
                                                                     
                            
कौन गली में रहता हीरा, चाँद छुपा है किस गली में !!

नखरे वालियों कहां छुपी हो, सुरमे वालियों मुंडेरो पर आओ
ये शरारत सही नहीं है, दिलवालों को यूं ना सताओ !!

सांझ सवेरे दोनो वक्त लगाता हूं चक्कर पे चक्कर
हमराही कोई मिल जाये जो साथ चले जीवन के पथ पर !!

अक्सर बनिए कि हवेली पर इक चांद दिखता है !
चाहूं उससे नज़रें मिलाना पर अगले पल गुम हो जाता है !!

बाग है पूरा शहर मोहब्बत का जिसमें यह कलियाँ खिलती हैं
हम भंवरे मंडराते रहते देख के दुनिया जलती है !!

मेरे चांद के चेहरे पर तिल रूपी इक दाग है
वही सुंदरता है उसकी पर दिल उसका बेदाग है !!

वो बनिए कि बेटी अक्सर देखा के मुझको मुस्कुराती
मेरे मन मंदिर की राधा है जिसे देख के शहनाई बज उठती !!

आज संवर कर निकला है मेरा चांद गली में !
हाय मेरा दिल घायल हो गया देख के परि जमीं पे !!

साईकिल लेके निकल पड़ा हूं शहर-ए-मोहब्बत कि गलियों में !
कौन गली में रहता हीरा, चाँद छुपा है किस गली में !!


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8 months ago
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