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मेरे अल्फाज़

अपाहिज़ कुर्सी

चौहान रविता

9 कविताएं

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अपाहिज कुर्सी

सुनो दास्तां आज
एक कुर्सी की
जो रखी है शायद
हर सरकारी दफ्तर में
न जाने कितने वर्षों पुरानी है वह......॥
दफ्तर में हाजिर
बड़ा आदमी हो या
कोई मामूली इंसान
सब बैठते हैं उस पर
लेकिन है बड़ी आरामदायक वह कुर्सी.....॥
घसीट कर रखो
या उठाकर पटको
बिल्कुल सही सलामत है
पूरी काया ही गजब है उसकी
सिवाय उसकी टूटी हुई दो बाजुओं के.......॥
अंत में कबाड़ी वाले
के पास ही जाएगी
किंतु मरम्मत होने
के लिए बिल्कुल नहीं
भई सरकारी दफ्तर की कुर्सी जो है............॥
कुर्सी पर शान से
बाहें फैलाकर नहीं
बैठ सकता है कोई
शायद यही कारण है
कि बैठने वाले को कभी घमंड नहीं आता........॥
हर कोई बेठने से पूर्व
सौचेगा ज़रूर कि
बैठूं या नहीं किंतु
कार्य करवाना है तो
कुर्सी भद्दी ही क्यों न हो बेठना तो मज़बूरी है.........॥
बड़ा आदमी बैठे
अपना रौब नहीं दिखाता
और आम आदमी बेठे
तो छोटा महसूस नहीं करता
यही तो खासियत है ज़नाब...........
सरकारी दफ्तर में लगी अपाहिज कुर्सी की...........................॥
(रविता चौहान)
12/03/2019




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