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मेरे अल्फाज़

गिद्ध

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मजबूर, गरीब,लाचार, को नोचते है गिद्ध
स्वयं की क्षुधा के आगे कहाँ सोचते हैं गिद्ध

मज़हबी घोंसलें ज़मी पर बनाते हैं गिद्ध 
डांगर दिखने पर नीचे आते है गिद्ध

हड्डियों को हड्डियों से लड़ाते है गिद्ध
बैठकर एक साथ दवात उड़ाते हैं गिद्ध

खून से सने चोंच, भारत माँ के आँचल में पोछते है गिद्ध
कुछ वर्षों के लिए फ़िर न जाने कहाँ उड़ जाते है गिद्ध

- कुमार मुकेश

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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