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shaukat azmi broke her engagement after listening to poetry of kaifi azmi

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कैफ़ी आज़मी की एक नज़्म सुन शौक़त ने तोड़ दी थी अपनी मंगनी

राजेश कुमार यादव, आज़मगढ़

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मज़लूमों के शायर कैफ़ी आज़मी ने एकबार कहा था कि "मैं ग़ुलाम हिन्दुस्तान में पैदा हुआ,आज़ाद हिन्दुस्तान में बूढ़ा हुआ और सोशलिस्ट हिन्दुस्तान में मर जाऊंगा।" यह बात अलग है कि उर्दू शायरी की तरक़्क़ीपसंद धारा की सबसे मज़बूत आवाज़ कैफ़ी साहब बहुत ही सशक्त, मार्मिक रोमांटिक शायर भी थे। कैफ़ी आज़मी अपने अंदाज़ से महफिलों में छा जाते थे। वे जब कलाम पढ़ने के लिए बुलाए जाते तो पढ़ने के बाद पूरे मुशायरे को अपने साथ ले जाते थे। 1947 में हैदराबाद में आयोजित एक मुशायरे में कैफ़ी की प्रस्तुति ने एक हसीना को किसी और के साथ अपनी मंगनी तोड़ने पर मजबूर कर दिया था। कैफ़ी अपनी मशहूर नज़्म 'औरत' सुना रहे थे, 

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे 
क़द्र अब तक तेरी तारीख़ ने जानी ही नहीं 
तुझ में शोले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहीं 
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं 
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं 
अपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझे 
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे 


कैफ़ी आज़मी की नज़्म सुनकर अपनी मंगनी तोड़ने वाली वह लड़की थीं शौक़त आज़मी। हैदराबाद के मुशायरे में कैफ़ी साहब की शौकत से यह मुलाक़ात जल्द ही शादी में तब्दील हो गयी। आज़ादी के बाद उनके पिता और भाई पाकिस्तान चले गए। लेकिन कैफ़ी आज़मी ने हिंदुस्तान में ही रहने का फ़ैसला किया। शादी के बाद बढ़ते खर्चों को देखकर कैफ़ी ने एक उर्दू अख़बार के लिए लिखना शुरू कर दिया, जहां से उन्हें हर महीने 150 रुपये बतौर वेतन मिला करता था। घर के बढ़ते खर्चों को देख उन्होंने फ़िल्मी गीत लिखने का इरादा किया। कैफ़ी की फ़िल्मी दुनिया में बतौर लोकप्रिय गीतकार अच्छी ख़ासी दखलअंदाज़ी थी। उन्होंने क़रीब 90 फ़िल्मों में 250 गीत लिखे। शायराना मिज़ाज कैफ़ी के फ़िल्मी गीतों में भी शायराना रंग और साहित्यिक रस देखा जा सकता है। उनके दिल को छू लेने वाले बहुत से फ़िल्मी गीत लोकप्रिय हुए हैं। 

कैफ़ी ने सबसे पहले शाहिद लतीफ़ की फ़िल्म 'बुज़दिल' के लिए दो गीत लिखे। इसके बाद 1959 की 'कागज़ के फूल' के लिए लिखे गए 'वक़्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे न तुम हम रहे न हम' लिखा। 1965 की 'हक़ीक़त' का गीत 'कर चले हम फिदा जानो तन साथियो, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों' उनके सबसे कामयाब गीतों में था। गीतकार के रूप में कैफ़ी आज़मी की कुछ प्रमुख फिल्में- शमा, शोला और शबनम, कागज़ के फूल, सात हिंदुस्तानी, अनुपमा, हिंदुस्तान की कसम, पाकीज़ा, हीर रांझा, बावर्ची, अर्थ, फिर तेरी कहानी याद आई। 

कैफ़ी साहब उन कुछेक शायरों में थे जिन्हें साहित्य में दाद तो मिली ही, सिनेमा में भी सफलता और शोहरत मिली। कैफ़ी आज़मी ने फ़िल्म 'गरम हवा' की कहानी, डायलॉग्स और स्क्रीनप्ले भी लिखे। इसके लिए उन्हें फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला। उन्होंने फ़िल्म हीर-रांझा में डायलॉग्स लिखे और श्याम बेनेगल की फ़िल्म 'मंथन' की पटकथा भी लिखी। 

की है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ
थोड़ा सा प्यार भी मुझे दे दो सज़ा के साथ
गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो
डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ 
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