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पोखर

Harindra Prasad

7 कविताएं

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यहीं कहीं एक पोखर था
जिसके किनारे अटल था
बूढ़ा सेनुरहवा आम
जिसकी कोटड़ में बच्चे
ढूढ़ते थे तोते के बच्चे
आम की डालिया जान बुझ कर
लटकती रहती थीं
पोखर के पानी में
जिस पर चढ़ कर
बच्चे कूदते थे
पोखर के पानी में
जून के महीने में
जब टपकने लगता था
सेनुरहवा आम तब
बच्चे आम पर ढेला मारते
और फुर्र से उड़ जाते
सैकड़ों हरे- हरे तोते
पोखर के उस पार
और कुछ ही देर में
घूम- घाम कर फिर से
बैठ जाते सेनुरहवा आम पर
और अपनी चोचों से
मार- मार कर गिरा देते
सेनुरहवा आम बच्चों के लिए
बच्चे खुश होकर रख लेते
पके आमों को अपनी जेब में
अब वहा नहीं है
सेनुरहवा बूढा आम
उदास पड़ी है
खेतों की मेड़
अब बच्चे नहीं आते
पोखर के पास क्योंकि
सेनुरहवा बूढ़ा आम
कट चुका है और
पोखर अब पट चुका है l
.
-हरिंद्र प्रसाद

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