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साहिर लुधियानवी

मैं इनका मुरीद

साहिर लुधियानवी: कलाम का कमाल, अपनी शर्तों पर...

शीबा राकेश, लखनऊ

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’’दुनिया ने तर्जुबा-ओ हवादिस की शकल में,
  जो कुछ मुझे दिया है, लौटा रहा हूँ मैं।’’

        
साहिर लुधियानवी की असीम शख्सियत को उनके कलम की नोक के एक तोहफे पर समेटना कुछ ऐसा होगा कि जैसे आसमां को एक डिब्बे में बंद करने की जद्दोजेहद। पर जैसे आसमान का सिमटा हुआ अक्स भी उसके फैलाव पर असमंजस पैदा करता है, वैसे ही साहिर का एक गीत, उनकी एक नज़्म, उनकी शख्सियत की रूमानियत, उसकी व्यवहारिकता, उनकी हंसी, उनके रंज और उनके व्यक्तिगत गुरूर को एक ही झटके में बयां कर देता है। साहिर दुनियावी एहसास के जीते जागते आईना थे। 08 मार्च, 1921 की पैदाइश, साहिर लुधियानवी का असल नाम था, अब्दुल हयी। एक कठिन पिता और एक जुझारू और ममतामयी माँ के बीच झूलते, साहिर के कठिन बचपन ने जो कुछ देखा, जो कुछ समझा, उन एहसासों ने उनके ख्वाबों, उनकी कलम, उनकी रूह और उनके इश्क पर जबरदस्त असर डाला। आजा़दी के परवाने बन कर, हिन्दुस्तानियों के दिलों की कड़वाहट को कागज़ पर उतारने वाले साहिर ने, देश के बंटवारे और इश्क ओ रूमानियत के कई पहलुओं को तीर की तरह इस्तेमाल कर, लोगों के एहसासों पर सीधा-सीधा वार किया। और यह वार कविता और शायरी की दुनिया से लेकर फिल्मी गीतों के उनके सफर तक यूं ही धारदार बना रहा।
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साहिर के गीत इश्क की ज़िद को खूबसूरती से तराशते हैं

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