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मुनीर नियाज़ी: शायरी का एक ऐसा गुलदस्ता जिसमें हर रंग के फूल हैं 

मुनीर नियाज़ी: शायरी एक ऐसा गुलदस्ता जिसमें हर रंग के फूल हैं।
                
                                                                                 
                            उर्दू शायरी में मुनीर नियाज़ी, फैज़ अहमद फैज़ के बाद आने वाला नाम है। उनका लहजा बेहद नर्म और ख़्याल मख़मल की तरह मुलायम थे। न उनकी आवाज़ में कभी तल्ख़ी सुनी गई न उनकी शायरी में। बड़ी से बड़ी बात को बिना हंगामे के आसानी से कहने के लिए पहचाने जाने वाले मुनीर नियाज़ी की शायरी में एक नयापन है। उनकी शायरी में ज़बान की ऐसी रिवायत है कि जिसमें मुल्क और ग़ैरमुल्की ज़बानों की विरासत मिलती है।
                                                                                                


वास्वत में मुनीर नियाज़ी की शायरी अपने समय से काफी आगे जाकर भविष्य की नब्ज़ पर हाथ रख कर उसे संवारने का संदेश देती है। नियाज़ी की सोच और कलाम का फलक इतना विस्तृत है कि आप उनकी ग़ज़लों में आने वाले समय की धड़कनों को साफ़ सुन सकते हैं - 

तोड़ना टूटे हुए दिल का बुरा होता है,
जिस का कोई नहीं उस का तो ख़ुदा होता है। 

माँग कर तुम से ख़ुशी लूँ मुझे मंज़ूर नहीं,
किस का माँगी हुई दौलत से भला होता है। 

लोग नाहक किसी मजबूर को कहते हैं बुरा,
आदमी अच्छे हैं पर वक़्त बुरा होता है। 

क्यों "मुनीर" अपनी तबाही का ये कैसा शिकवा,
जितना तक़दीर में लिखा है अदा होता है। 
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1 month ago

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