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अभिव्यक्ति की दूरी को कम करना अलवी का आर्ट है- निदा फाज़ली

मैं इनका मुरीद

अनुभव और अभिव्यक्ति की दूरी को कम करना अलवी का आर्ट है- निदा फाज़ली 

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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अलवी की शायरी आधुनिक शायरी के एक बड़े हिस्से की भांति पाठक से सवाल- जवाब नहीं करती। उसकी हर नज़्म या ग़ज़ल शीशे की तरह पारदर्शी होती है जिसमें पाठक आसानी से अपना चेहरा देख सकता है। अनुभव और अभिव्यक्ति की दूरी को कम करना अलवी का आर्ट है। 

रात मिली तन्हाई मिली और जाम मिला 
घर से निकले तो क्या-क्या आराम मिला 

एक बहुत ही बोझल शाम के आते ही 
सूने दिल को यादों का कोहराम मिला 

वही मुहल्ला, वही पुराना घर था वहां 
दरवाज़े पर लेकिन और ही नाम मिला 

काम की ख़ातिर दिनभर दौड़ लगाते हैं 
बेकारी में आख़िर कुछ तो काम मिला 
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उदास है दिन हंसा के देखें 

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