दुनिया में भाषाएं भले अनेक हों किंतु प्यार की तो एक ही भाषा है

दुनिया में भाषाएं भले अनेक हों किंतु प्यार की तो एक ही भाषा है।
                
                                                             
                            अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य #हिंदीहैंहम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। प्रस्तुत है हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि और लेखक 'कुंवर नारायण' की काव्य  चेतना पर अभिषेक शर्मा का लेख- 
                                                                     
                            

कुंवर नारायण का काव्य मनुष्य और समाज के बीच रागात्मक संबंध के प्रसार का काव्य है। निस्संदेह प्रेम ही वह तत्व है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। कवि का स्पष्ट मत है कि दुनिया में भाषाएं अनेक हैं किंतु प्यार की भाषा पूरी दुनिया में सर्वथा एक ही है, और इसी के द्वारा 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना का प्रचार-प्रसार होता है।  कुंवर नारायण का काव्य मानवीय विकृतियों और दुर्बलताओं के विनाश का काव्य है। मानवीय विश्वास की सहज बहाली, सत्य की स्थापना और प्रेम का प्रसार उनकी रचनाशीलता का मूल धर्म है। 'एक अजीब-सी मुश्किल' कविता में वे लिखते हैं- 

एक अजीब सी मुश्किल में हूं इन दिनों-
मेरी भरपूर नफरत कर सकने की ताकत
दिनों-दिन क्षीण पड़ती जा रही,

मुसलमानों से नफ़रत करने चलता
तो सामने ग़ालिब आकर खड़े हो जाते
अब आप ही बताइए किसी की कुछ चलती है
उनके सामने?
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3 weeks ago

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