इब्ने इंशा : जिनकी कविताओं से उठती है आषाढ़ की पहली बारिश के बाद वाली मिट्टी की ख़ुशबू

इब्ने इंशा
                
                                                             
                            कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा।
                                                                     
                            
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा।

हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए,
हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था परदा तेरा।


'कल चौदहवीं की रात थी...' इब्ने इंशा की इस ग़ज़ल को जब जगजीत सिंह ने अपनी संगमरमरी आवाज़ में गाया तो प्रेम रस में डुबकी लगाने वाले मदहोश हो गए। शायरी, ग़ज़ल, नज़्म, कविता, कहानी, नाटक, डायरी, यात्रा वृत्तांत, संस्मरण साहित्य की इन सब विधाओं में इब्ने इंशा ने अपने कौशल का लोहा मनवाया है। 

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटीं महफ़िलें
हर शख़्स तेरा नाम ले हर शख़्स दीवाना तिरा
 
कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएं मगर
जंगल तिरे पर्बत तिरे बस्ती तिरी सहरा तिरा
 
बेदर्द सुननी हो तो चल कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल
आशिक़ तिरा रुस्वा तिरा शाइर तिरा 'इंशा' तिरा


इब्ने इंशा उर्दू और हिंदी दोनों में ही बहुत सरल शब्दों में लिखते थे। उनकी एक नज़्म 'बस्ती में दीवाने आए' देखिए,

बस्ती में दीवाने आए
छब अपनी दिखलाने आए
देख देरे दर्शन के लोभी
करके लाख बहाने आए
 
पीत की रीत निभानी मुश्किल
पीत की रीत निभाने आए
उठ और खोल झरोखा गोरी
सब अपने-बेगाने आए
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2 months ago

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