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मैं इनका मुरीद

मेरे पिता

Harindra Prasad

7 कविताएं

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चमरौधे जूते को
कड़वे तेल में भिगोकर
रिश्तेदारी जाते हुए
आज भी याद आते हैं
मेरे पिता।

भादों के महीने में
सन की बुद्धि लगे
लकड़ी के पौवे को पहनकर
कीचड़ पार करते
आज भी याद आते हैं
मेरे पिता।

सावन के महीने में
लेव में हल चलाकर
सड़ चुकी कलबलाती उंगलियों को
डढुआ का तेल लगाकर
आग पर सेंकते हुए
आज भी याद आते हैं
मेरे पिता।

बरसात के महीने में
मेहराये हुए चने को
कंडी की आग में डभका कर
खाते हुए
आज भी याद आते हैं
मेरे पिता।

बांस के हेंगे पर
कुंए के बीचों बीच
खड़े खड़े ढेकुल चलाकर
अकड़ी हुई कमर को
सीधा करते
आज भी याद आते हैं
मेरे पिता।

-हरिन्द्र प्रसाद

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