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शीन काफ़ निज़ाम

मैं इनका मुरीद

जो छिपाना नहीं जानता, वो बताएगा क्या : शीन काफ़ निज़ाम

रत्नेश मिश्र, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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''हमें लगता है कि ज़बाने तहज़ीबों की होती हैं मज़हबों की नहीं, और जब तहज़ीबों की ज़ुबान होती है तो उसमें हिंदी, उर्दू, राजस्थानी, तेलगू, तमिल, मलयालम सब हमारी ज़बाने हैं।

संस्कृत में तालीम पाने के बाद उर्दू अदब अपनाने के चलते  शुरुआत में थोड़ी बहुत दिक्कत हुई लेकिन आज मैं यह कहने की स्थिति में हूं कि मुझे हिंदू-मुसलमान दोनों का ख़ूब प्यार मिला।''

यह कहना था आधुनिक उर्दू शायरी के सशक्त हस्ताक्षर शीन क़ाफ निज़ाम का।  दरअसल वो  शिव कृष्ण बिस्सा से उर्दू में शीन काफ़ हुए और अपने शेरों, ग़ज़लों के माध्यम से लोगों को तहज़ीब, अमन और इंसानियत की सलाहियत देने लगे।  निज़ाम साहब इस दौर के उन चुनिंदा शायरों में से हैं जिन्होंने मंच की गंभीरता को कभी हल्का नहीं होने दिया।

अपने अफ़्साने की शोहरत उसे मंज़ूर न थी
उस ने किरदार बदल कर मिरा क़िस्सा लिक्खा।
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सपना सच से बड़ा है...

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