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Firaq Gorakhpuri

मैं इनका मुरीद

फ़िराक़ की शायरी में मौजूद है हिंदुस्तान की ख़ालिस धमक.....

राकेश मिश्र, वर्धा

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इक जानी हुई दुनिया इक आलमे हैरत है 
इन दोनों का मिल जाना दुनिया-ए-मुहब्बत है 


फ़िराक़ साहब जब यह शेर फरमाते हैं, तो बहुत ही पुरज़ोर लफ़्ज़ों में अपनी ग़ज़लों को किसी आसमानी ताक़त और ग़ैर दुनियावी मामलों से जोड़कर देखने से बरजते हैं। उनके मुताबिक़ ये ग़ज़लें वही या इल्हाम नहीं हैं। ख़ुदा या ज़िब्रील से इनका कोई ताल्लुक़ नहीं । न अर्श व कुद्श (पवित्रता) से इसका कोई वास्ता है। उनके हिसाब से उनकी 'ग़ज़लें’ इस मानूस तरीन व अजीबतरीन दुनिया-ए मुहब्बत के कुछ अधसुने राग हैं। 

‘कुछ और भी तो हो इन इशारात के सिवा
यह सब तो ए निगाहें करम बात बात बात 
इक उमर कट गई है, तेरे इंतजार में
ऐसे भी हैं कि कट न सकी जिनसे एक रात
अजीबतरीन तो इतना है कि 
दिल ही में कोई रह-रह के झिझक उठता है 
सुनते हैं इश्क़ ज़माने में है बदनाम बहुत 
आ ही जाती है मगर फिर भी मिटे दर्द की याद 
गरचे है तर्के मुहब्बत में भी आराम बहुत' 
पैदा करे ज़मीन नई आसमान नया 
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नयेपन के मुरीद...

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