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अहमद फराज

मैं इनका मुरीद

अहमद फ़राज़: ख़्वाब को यथार्थ में जाकर समझने की कोशिश...

शरद मिश्र-अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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अहमद फराज की शायरी दर्द का सौदा जरूर है लेकिन वह इसी दर्द का रोना नहीं रोती। दो कदम आगे बढ़कर दिल की धड़कन को एक प्रेरणा बना देती है। ख्वाब को यथार्थ में जाकर सोचने, सहने और समझने का काम बहुत कम शायर कर पाते हैं। लेकिन अहमद फराज ने इसे कर दिखाया है। मैं इसी वजह से फराज का मुरीद हूं। मोहब्बत उनकी विशेषता है लेकिन वह इसे दर दर में फैलाने का काम भी बखूबी करते हैं।  

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा

इतना मानूस न हो ख़िल्वत-ए-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा

तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ए-रफ़ाक़त से उतर जाएगा

किसी ख़ंज़र किसी तलवार को तक़्लीफ़ न दो
मरने वाला तो फ़क़त बात से मर जाएगा

ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जानेवाला
तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जाएगा

डूबते-डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा

ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का "फ़राज़"
ज़ालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जाएगा आगे पढ़ें

रातों के तेरी यादों के खुर्शीद उभरते...

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