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मैं इनका मुरीद

संदेश

Jayti jain

18 कविताएं

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प्रलय आ जाता है
जब हवाये संदेश नहीं ले जातीं
तुम तक पैगाम नहीं पहुचातीं 
गुस्सा आता है बहुत मुझे
जब तुम्हे मेरे पास नहीं लातीं 
रूठ जाती हूं अक्सर जब भी
तेज झोंके से मुझे डराती हैं ।

सहम जाती हूं मैं तब
और तुम्हारी याद बहुत सताती है 
ये बैरन हवा ! मुझ पर हंसती है
मुझे जोगन बताती है।

इसे क्या पता प्रीत होती क्या है नूतन
ये जरिया है जो तुम तक संदेश पहुचाती है 
जी तो करता है इसे कैद करके रख दूं कहीं
जब भी ये बिना पैगाम के लौट आती हैं 
अगले ही पल ठहर जाती हूं मैं सोचकर
यही एक उम्मीद है जो मेरा प्रेम तुम तक पंहुचा सकती है
ना जाने कैसी दुश्मनी है इसकी मुझसे
तुमको करीब क्यूं ? नहीं लाती है।

वो तो कान्हा बन रासकर रहा है
रोज़ कानों में ताने कस जाती है
ऐसी क्या मज़बूरी, ऐसी क्या लाचारी ?
जो तुमको मेरे पास आने नहीं देना चाहती है।

मैं जानती हूं प्रिय
मेरा संदेश तुम तक पंहुचा जरूर होगा,
लेकिन
ये सौतन सी हवा
तुम्हारा संदेश मुझतक नहीं पहुंचाती है।

- जयति जैन 'नूतन'
  रानीपुर, झांसी, उ.प्र.

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