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अलग-अलग ज़बानों पर चुनिंदा शेर...

काव्य चर्चा

अलग-अलग ज़बानों पर चुनिंदा शेर...

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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हर इक ज़बान को यारो सलाम करते चलो
गिरोह की है न फ़िरक़े की और न मज़हब की
- नाज़िश प्रतापगढ़ी

अगर चराग़ की लौ पर ज़बान रख देता
ज़बान जलती भी कब तक चराग़ जलने तक
- सालेह नदीम

आवाज़ दे के देख लो शायद वो मिल ही जाए 
वर्ना ये उम्र भर का सफ़र राएगाँ तो है 
- मुनीर नियाज़ी आगे पढ़ें

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