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‘शहर’ पर 20 बेहतरीन शेर…

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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आलीशान इमारतें, समतल और चौड़ी सड़कों पर फर्राटा दौड़ती कारें और चकाचौंध रौशनी जब दिखने लगे तो समझिये कि आप अपने गांव-जवार से दूर किसी शहर में हैं। बदलते वक्त के साथ ‘शहर’  हमारी जरूरत बनता गया। नगरीय जीवन ने हमें एक तरफ आर्थिक उन्नति का ढांचा दिया तो दूसरी तरफ भाग-दौड़ भरी जिंदगी भी, जिसमें आपसी रिश्ते बहुत प्रभावित हुए। तन्हाइयां बढ़ीं, संयुक्त परिवार टूटे। शेरों-शायरी श्रृंखला में आज हम पाठकों के लिए पेश कर रहे हैं ‘शहर’ पर शायरों के कुछ जज़्बात-    
 
कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फ़ासले से मिला करो
-बशीर बद्र

शहर के दंगों में जब भी मुफ़लिसों के घर जले
कोठियों की लॉन का मंजर सलोना हो गया
-अदम गोण्डवी
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