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अमृता प्रीतम

काव्य चर्चा

अमृता प्रीतम: आपकी उम्र की चिट्ठी सदा रुलाती रहे!

झांसी से बृज मोहन अमर उजाला काव्य के लिए

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दुखांत की अपनी-अपनी परिभाषा होती है। अगर बड़े दुख के बारे में सोच सकते हैं, तो उससे छोटा दुःख उतना कष्टदायी नहीं होता। अमृता प्रीतम की आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ दुखांत की आत्म-वेदना पर एक अलग दृष्टि प्रदान करती है। इस अंश को पाठकों को समक्ष पेश किया जा रहा है। 


दुखांत यह नहीं होता कि रात की कटोरी को कोई जिंदगी के शहद से भर न सके और वास्तविकता के होंठ कभी उस शहद को चख न सके।
दुखांत यह होता है, जब रात की कटोरी पर से चंद्रमा की कलई उतर जाए और उस कटोरी में पड़ी हुई कल्पना कसैली हो जाए। 
दुखांत यह नहीं होता कि आपकी किस्मत से आपके साजन का नाम-पता न पढ़ा जाए और आपकी उम्र की चिट्ठी सदा रुलाती रहे। 
दुखांत यह होता है कि आप अपने प्रिय को अपनी उम्र की सारी चिट्ठी लिख लें और फिर आपके पास से आपके प्रिय का नाम-पता खो जाए। 
दुखांत यह नहीं होता कि जिंदगी की लंबी डगर पर समाज के बंधन अपने कांटे बिखेरते रहें और आपके पैरों से सारी उम्र लहू बहता रहे। 
दुखांत यह होता है कि आप लहू-लुहान पैरों से एक उस जगह पर खड़े हो जाएं, जिसके आगे कोई रास्ता आपको बुलावा न दे। 
दुखांत यह नहीं होता कि आप अपने इश्क के ठिठुरते शरीर के लिए सारी उम्र गीतों के परहन सीते रहें। 
दुखांत यह होता है कि इन परहनों को सीने के लिए आपके पास विचारों का धागा चूक जाए और आपकी कलम-सुई का छेद टूट जाए।
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