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काव्य चर्चा

बेबस किसान

Thakur Bobiesh

12 कविताएं

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सोने की खान सी,
यह उर्वर भूमि भी सिसक रही है,
किसान के बदन से,
पसीने की बूंदों संग आंखों से बूंदें गिर रही है,
यह उर्वर भूमि यह पहचान गई हैं,
कि,
ये आंसू हैं,
लेकिन ये सरकारें,
कब सिसकेंगी,
कब वह वजहें पहचानेंगी,
जो किसान जैसे योद्धा को रुला रही हैं

-वीपी ठाकुर

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