आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Kavya Charcha ›   tanvi goswami thumri on sawan
तन्वी

काव्य चर्चा

दिन नहिं चैन रात नहिं निंदिया अबके सावन घर आ जा

अनूप ओझा/ अमर उजाला, वाराणसी

2488 Views
घन और श्याम दोनों एक ही वर्ण के हैं। सावन का भी रंग श्याम ही होता है। यही वजह है कि काली घटाएं विरह बढ़ा देती हैं। बारिश की बूंदें यौवन को निखार देती हैं। ज़िंदगी में रस घोल कर मदहोश बना देती हैं। इस महीने की बारिश की फुहारों को निहारना जितना अच्छा लगता है, उससे भी अधिक खुशी भीगने में होती है। फूल-पत्तियों का निखरा हुआ रंग भला किसे नहीं सुहाता होगा। बनारस घराने की ठुमरी गायिका तन्वी गोस्वामी वर्षा ऋतु में ऐसे ही सौंदर्य का वर्णन करती हैं। 

बादर गरज नभ घोर रे शोर पपीहरा अति करत है 
धधकार सुन मंदिरन के मानो गुणिन लय सुर भरत है 
अतही प्रबल सो तान बरसत बूंद जैसे परत है 
डरपत है रिपुदल कटत सब हनुमंत जब हुंकरत है 
यह नाद ही के समुद्र में गायक गुणी सब तड़त है 
कहें रामदास गोविंद के पदकमल निशिदिन परत है...। 


तन्वी गोस्वामी राग मेघ मल्हार में पं. बड़े रामदास की रचित रूपक ताल की बंदिश के जरिए वर्षा ऋतु पर रोशनी डालती हैं- वह बताती हैं कि जब घनघोर बारिश होती है तब ताल-सुर की बारिश का अहसास एक सुर साधक के जेहन में होने लगता है। इस बंदिश में बादलों की गरज हुंकार की तरह की गई है। बारिश की फुहारों की स्तुति उस ईश्वर के पद कमल से की गई है, जो किसी नायिका के लिए परदेस गया होता है और वह उसका इंतज़ार कर रही होती है। 

तन्वी अपने गुरु पं. देवाशीष दे की रचित कजरी से इस महीने की खूबियों में रंग भरती हैं- 

मोतियन बूंद पड़े मोरे अंगना 
भींजे अंग ना भींगे अंगना... 
कारी बदरिया घिर घिर आई 
बरसन लागी पिया मोरा संग ना 
चातक मन की प्यास बुझाओ 
अगन जिया की ताप बुझाओ 
सूखे मन हरियाली लाओ 
झिर झिर बरसे मोरे नैना...। 


सावन की इस बिरह-व्यथा के भावों में नायिका के अंग नहीं भीगते आंगन भीगता है...। 
वह कजरी गाती हैं- 

अइले सवनवा बरसे नयनवा झंकियन झकोरे बैरी पवनवां...
अमवा की डारी पे परल हिंडोलना
झूला झूले सखी संग ले सजना
झूलना हमार हो झुलावे पवनवा...। 


वह झूला पर आलाप लेती हैं- 

झुलनवा झूलें सखि सिया रघुबीर 
सिया रघुबीर झूलें सरजू के तीर 
श्यामल रंग के परल हिंडोलना श्यामल रंग की डोर...। 


तन्वी सावन में प्रियतम के इंतजार का जिक्र राग माज खमाज की ठुमरी में इस तरह करती हैं- 

अबके सावन घर आ जा
दिन नहिं चैन रात नहिं निंदिया
आके गले से लगा जा...। 


सावन को मीराबाई ने किस रूप में देखा है, इसकी भी बानगी वह देती हैं- 

हे सावण दे रह्या गिरा रे के घर आयो जी श्याम मोरा 
उमड़ घुमड़ चहुंदिश ते आए गरजत है घनघोरा...। 


वह झूला के जरिए सावन की खुशी का इज़हार भी खूब करती हैं- 

हरे राम लागो सावन को महीना झूला डारो रे हरी...
दादुर मोर पपीहरा बोले कि मोरे रामा मोहन की मुरली बाजे झूला डारो रे हरी...।
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!