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काव्य चर्चा

विराम

Sumit Pareek

4 कविताएं

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संघर्ष पथ पे बहुत चला इस दुनिया से मैं खूब लड़ा पर
इन बातों से मैं विराम मांगता हूं मैं हार मानता हूं।

दुनिया से मैं खूब लड़ा पर अब अपने अपनों से ही हार मानता हूं मैं विराम मांगता हूं
लड़ के गिरना गिर के उठना फिर चल देना ये मुझे खूब सुहाता है।

पर स्वयं से लड़ना फिर भी हंस देना अब ये न दिल को भाता है
इन शब्दों के ही साथ खड़ा संघर्ष की राह में आगे बढ़ा
पर अब न ये पथ भी मुझे सुहाता है ये पथ भी अब मुझसे विराम मांगता है संघर्ष से हार मांगता है।

इस कलम ने ही साथ दिया हर वक्त मेरा भान किया पर
अब इससे भी में क्षमा मांगता हूं मैं विराम मांगता हूं मैं हार मानता हूं
मेरी हार का अर्थ ये नहीं की समय तू मुझसे जीता है

इस हार में भी मेरी जीत, संघर्ष में ही मेरी जीत सही
पर वक्त कुछ और बया मांगता है, ये मुझसे विराम मांगता है ।
मै हार मानता हूं मैं विराम मांगता हूं।

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