आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Kavya Charcha ›   viram

काव्य चर्चा

विराम

Sumit Pareek

4 कविताएं

747 Views
संघर्ष पथ पे बहुत चला इस दुनिया से मैं खूब लड़ा पर
इन बातों से मैं विराम मांगता हूं मैं हार मानता हूं।

दुनिया से मैं खूब लड़ा पर अब अपने अपनों से ही हार मानता हूं मैं विराम मांगता हूं
लड़ के गिरना गिर के उठना फिर चल देना ये मुझे खूब सुहाता है।

पर स्वयं से लड़ना फिर भी हंस देना अब ये न दिल को भाता है
इन शब्दों के ही साथ खड़ा संघर्ष की राह में आगे बढ़ा
पर अब न ये पथ भी मुझे सुहाता है ये पथ भी अब मुझसे विराम मांगता है संघर्ष से हार मांगता है।

इस कलम ने ही साथ दिया हर वक्त मेरा भान किया पर
अब इससे भी में क्षमा मांगता हूं मैं विराम मांगता हूं मैं हार मानता हूं
मेरी हार का अर्थ ये नहीं की समय तू मुझसे जीता है

इस हार में भी मेरी जीत, संघर्ष में ही मेरी जीत सही
पर वक्त कुछ और बया मांगता है, ये मुझसे विराम मांगता है ।
मै हार मानता हूं मैं विराम मांगता हूं।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!